ग़ज़ल तुझ में कोई क़सर नहीं लगती तूं ज़मीं की मगर नहीं लगती शुक्र तुम ने छुआ नहीं वरना शहर में कुछ ख़बर नहीं लगती पूछ ले तूं किसी से..अच्छे थे काश तेरी नज़र नहीं लगती लोग सारे लगे मुझे अच्छे दुनिया तेरी मगर नहीं लगती हमसे मिलके उदय किसी को भी इस जहां की नज़र नहीं लगती उदय झांझनी
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